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प्रेम की परिभाषा क्या है

प्रेम की परिभाषा क्या है,
आशा और निराशा क्या है।
मैं अब तक ये समझ सका ना,
इस जीवन की गाथा क्या है।


लोगों ने तो यह कह डाला
यह संसार है नाटकशाला
इसमें हम करते चरित्र क्यों,
इसका सही खुलासा क्या है।


दुःख में निकलते हैं आंसू क्यों
सुख में मिलता है सुकून क्यों
ना मैं जानूँ सबब क्या इनका,
आखिर यहाँ तमाशा क्या है।


आज गया तो कल भी होगा
इस उलझन का हल भी होगा
कोई मुझे बता दे इन पर,
छाया हुआ कुहासा क्या है।

"मेरे अज़नबी"

क्यूँ अज़नबी होकर भी,
दिल के करीब हो तुम I
क्यूँ इक ख्वाब बनकर,
मन के करीब हो तुम I

कुछ सोचता हूँ जब भी
कुछ चाहता हूँ जब भी
आ जाता है नज़र क्यूँ
चेहरा तुम्हारा
क्यूँ ऐसा लगता है,
मेरे हबीब हो तुम I


क्यूँ देखता हूँ तुझमें मैं जीवन की खुशियाँ
क्यूँ देखते ही तुमको भर आती हैं अँखियाँ
तुम अज़नबी हो फिर क्यूँ
तुम्हे खोने का डर है
क्यूँ ये महसूस होता,
मेरे पल पल मे हो तुम I


क्यूँ तन्हाई मे साथ चाहूं तुम्हारा
क्यूँ लगता है तुम बिन ना जीना गंवारा
मैं बेचैन होता क्यूँ
देखकर तुमको औरों संग
क्यूँ प्यार करने लगा हूँ मैं तुमसे,
क्यूँ बनके धड़कन दिल मे बसे हो तुम I




"समर्पित मन"

तुम कभी सोचकर देखो
मेरे बारे में
तुम्हें मिलेगा
अपनापन
बिछी पलकें 
समर्पित मन I


तुम कभी आज़माकर देखो
खुद को मेरी तरह
तुम्हें मिलेगा
तरसता सा
पिघलता सा
ढला जीवन I


तुम कभी सज़ाकर देखो
सपनों का महल
तुम्हें मिलेगा
सूना सा
खाली सा
यादों का खंडहर I


तुम कभी निभाकर देखो
इक तरफ़ा मोहब्बत
तुम पाओगे
ठोकर
ज़िल्लत
दुनिया का कहर I


तुम कभी पिलाकर देखो
दो घूँट जहर
तुम्हें मिलेगा
वही अपनापन
बिछी पलकें
समर्पित मन I


दो घूँट जहर"

आँखों में बस जाओ तुम I
अब यूँ न मुझे तड़पाओ तुम II
दिल में प्रेम तुम्हारा है I
इक नाम इसे दे जाओ तुम II

ना ऐसे तुम तकरार करो
अब इश्क़ का तुम इकरार करो
कभी रंग न जिसका हो फीका I
वो प्यार मुझे दे जाओ तुम II

मैं शाम ढले सोचूँ तुमको
मैं सपनों में देखूं तुमको
हो जिसकी छवि न कभी धूमिल I
वो याद मुझे दे जाओ तुम II

कहीं गुजर ना जाए ये लम्हा
फिर रह जाएँ हम तुम तन्हा
वो पल आने से पहले I
"दो घूँट जहर" दे जाओ तुम II